मुंबई | महाराष्ट्र में चल रहे हिंदी बनाम मराठी विवाद की आग अब भोजपुरी सिनेमा तक पहुंच चुकी है। भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात कही है और उनका वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। भावनात्मक अंदाज़ में पवन सिंह ने कहा:
“क्या हम हिंदी बोलते हैं तो जान से मार दोगे?”
पवन सिंह का यह बयान उस समय सामने आया है जब हाल ही में दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ ने भी मराठी नेताओं और संगठनों को हिंदी भाषा पर विवाद करने को लेकर खुला चैलेंज दिया था।
क्या है पूरा मामला?
महाराष्ट्र में बीते कुछ महीनों से हिंदी भाषियों और मराठी भाषियों के बीच तनाव की खबरें लगातार आ रही हैं। लोकल संगठनों का आरोप है कि मुंबई और ठाणे जैसे इलाकों में हिंदी भाषी लोगों का वर्चस्व बढ़ रहा है और इससे मराठी संस्कृति खतरे में पड़ रही है। वहीं दूसरी ओर हिंदी भाषी समुदाय इसे भेदभाव और असहिष्णुता मान रहा है।
पवन सिंह ने क्या कहा?
पवन सिंह ने एक सोशल मीडिया वीडियो के ज़रिए भावुक अंदाज़ में अपनी बात कही:
“हम मेहनत करने आते हैं, किसी की भाषा छीनने नहीं। लेकिन अगर हमसे कहा जाए कि ‘हिंदी मत बोलो’, तो फिर क्या करें? क्या हम हिंदी बोलेंगे तो जान से मार दोगे?”
पवन सिंह का ये बयान भोजपुरी, हिंदी और अन्य हिंदी भाषी समुदाय के लाखों लोगों के लिए भावनात्मक जुड़ाव का कारण बन गया है। उनका वीडियो इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर तेजी से वायरल हो रहा है।
निरहुआ भी दे चुके हैं बयान
इससे पहले बीजेपी सांसद और भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ ने भी मराठी नेताओं को चैलेंज करते हुए कहा था:
“हिंदी को कमतर आंकने वालों को मैं खुला आमंत्रण देता हूं — आइए, एक मंच पर बात करें। हिंदी किसी पर थोपी नहीं जा रही, ये भारत की आत्मा है।”
सियासी रंग भी ले रहा है विवाद
भाषाई विवाद अब सिर्फ कलाकारों तक सीमित नहीं है, इसे राजनीतिक दलों द्वारा भी हवा दी जा रही है। कुछ मराठी संगठनों ने आरोप लगाया है कि हिंदी भाषी लोग स्थानीय नौकरियों और संस्कृति पर हावी हो रहे हैं, जबकि विपक्षी दल इसे बीजेपी की दोहरी नीति कहकर हमला बोल रहे हैं — एक ओर हिंदी का प्रचार, दूसरी ओर ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का नारा।
क्या कहते हैं जानकार?
भाषाविद् और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत जैसी विविधता भरी ज़मीन पर भाषाई विवाद संवेदनशील मामला है। किसी भाषा या समुदाय को कमतर आंकना संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है। वहीं पवन सिंह जैसे लोकप्रिय चेहरे अगर ऐसी भावनात्मक बातें कह रहे हैं, तो इससे समाज में वास्तविक चिंता और दर्द झलकता है।
अब सवाल यह है…
- क्या मराठी और हिंदी भाषियों के बीच यह टकराव गहराता जाएगा?
- क्या कलाकारों की आवाज़ से यह विवाद हल होगा या और बढ़ेगा?
- और सबसे अहम — क्या भाषा को राजनीति का हथियार बनाया जा रहा है?
एकता की बात करने वाले देश में अगर भाषा को ही ज़हर बना दिया गया, तो सवाल सिर्फ बोलने का नहीं बचेगा, बल्कि जुबान बचाने का होगा।




