हड़ताल में शामिल संगठनों का कहना है कि हाल ही में लिए गए सरकारी फैसले श्रमिकों और किसानों के हितों के खिलाफ हैं। इन फैसलों से मजदूरों की नौकरियों और सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है, जबकि कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट दखल बढ़ता जा रहा है।
किन बातों का विरोध?
- नए लेबर कोड्स
- कृषि क्षेत्र में निजीकरण
- महंगाई और बेरोजगारी
- सरकारी संपत्तियों का निजीकरण
ये हैं प्रमुख मांग
यूनियनों का कहना है कि उन्होंने पिछले साल श्रम मंत्री को कुछ मांगों का ज्ञापन सौंपा था, जिनमें ये प्रमुख हैं…
- बेरोजगारी दूर करने के लिए नई भर्तियां शुरू की जाएं
- युवाओं को नौकरी मिले, रिटायर्ड लोगों की दोबारा भर्ती बंद हो
- मनरेगा की मजदूरी और दिनों की संख्या बढ़ाई जाए
- शहरी बेरोजगारों के लिए भी मनरेगा जैसी योजना लागू हो
- निजीकरण, कॉन्ट्रेक्ट बेस्ड नौकरी और आउटसोर्सिंग पर रोक लगे
- चार लेबर कोड खत्म हों, जो कर्मचारियों के हक छीनते हैं
- मूलभूत जरूरतों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और राशन पर खर्च बढ़े
- सरकार ने 10 साल से वार्षिक श्रम सम्मेलन आयोजित नहीं किया।
सुरक्षा के इंतजाम
राज्यों में सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई है। पुलिस बलों को संवेदनशील इलाकों में तैनात किया गया है ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे।
सरकार की प्रतिक्रिया
अब तक केंद्र सरकार की ओर से इस हड़ताल पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन प्रशासन ने जनता से शांति बनाए रखने की अपील की है।
निष्कर्ष:
भारत बंद से आज देश के कई हिस्सों में सामान्य जनजीवन प्रभावित रहा। ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने साफ कहा है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।






