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हजारीबाग के मशहूर हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. भानु शंकर पर 12.50 लाख रुपये का जुर्माना, गलत इलाज से मरीज का पैर काटने की नौबत

On: August 31, 2025 6:23 AM
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"हजारीबाग डॉक्टर भानु शंकर पर चिकित्सीय लापरवाही का आरोप, उपभोक्ता फोरम ने लगाया ₹12.50 लाख का जुर्माना"

Hazaribagh News | Medical Negligence Case:
झारखंड के हजारीबाग जिले में एक बड़ा मेडिकल नेग्लिजेंस केस (Medical Negligence in India) सामने आया है। शहर के प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. भानु शंकर पर उपभोक्ता फोरम ने लापरवाही का दोषी मानते हुए ₹12.50 लाख का जुर्माना लगाया है। यह मामला अधिवक्ता परमानंद प्रधान द्वारा दायर शिकायत पर सुनवाई के बाद सामने आया।


📌 मामला कैसे शुरू हुआ?

5 नवंबर 2017 को अधिवक्ता परमानंद प्रधान एक नाली में गिरने से घायल हो गए और उनका पैर टूट गया। अगले ही दिन वे इलाज के लिए हजारीबाग के ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. भानु शंकर के पास पहुँचे।

डॉक्टर ने सलाह दी कि पैर में रॉड डालकर ऑपरेशन करना जरूरी होगा। 7 नवंबर 2017 को ऑपरेशन किया गया और मरीज को नियमित चेकअप की सलाह दी गई।

लेकिन कुछ हफ्तों बाद ऑपरेशन स्थल पर संक्रमण (पस भरना) शुरू हो गया। मरीज के अनुसार, जब उन्होंने डॉक्टर से फिर संपर्क किया तो उन्होंने इलाज से हाथ खड़े कर दिए।


🏥 पैर काटने की आ गई नौबत

परमानंद प्रधान ने बाद में रांची, पटना, हैदराबाद और शेखपुरा के कई डॉक्टरों से इलाज कराया। इस दौरान लगभग दर्जन भर ऑपरेशन भी हुए। संक्रमण इतना बढ़ गया था कि पैर काटने की नौबत आ गई।

सौभाग्य से, हैदराबाद के डॉक्टरों की सूझबूझ से उनका पैर बचा लिया गया। परमानंद प्रधान का कहना है कि उन्हें करीब पाँच साल तक इलाज कराना पड़ा, तब जाकर उनका पैर पूरी तरह ठीक हुआ।


⚖️ उपभोक्ता फोरम का फैसला

5 सितंबर 2022 को पीड़ित ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई (Complaint No. 71/2022)। फोरम के अध्यक्ष शिव कुमार शुक्ला की अध्यक्षता में मामले की सुनवाई हुई।

फोरम ने माना कि:

  • डॉक्टर की लापरवाही से मरीज को शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी।
  • मरीज को लंबे समय तक इलाज और आर्थिक नुकसान सहना पड़ा।

इसी आधार पर फोरम ने डॉ. भानु शंकर को पीड़ित को ₹12.50 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।


📢 नतीजा

यह मामला फिर से सवाल खड़ा करता है कि चिकित्सकीय लापरवाही (Medical Negligence) किस तरह मरीज की जिंदगी बदल सकती है। उपभोक्ता फोरम का यह फैसला पीड़ितों के लिए राहत और डॉक्टरों के लिए चेतावनी दोनों है कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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