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झारखंड कांग्रेस में फिर फूटा अंदरूनी बारूद: 49 में से सिर्फ 4 पहुंचे पर्यवेक्षक, भंग हुई कमेटी — संगठन में मची खलबली

On: November 1, 2025 7:29 AM
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रांची: झारखंड कांग्रेस की अंदरूनी कलह एक बार फिर सतह पर आ गई है। संगठन की ढिलाई और नेताओं की उदासीनता ने पार्टी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां अनुशासन से ज्यादा दिखावा हावी दिखाई दे रहा है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा नगर निकाय चुनाव की तैयारी के लिए गठित 49 पर्यवेक्षकों में से गुरुवार को हुई बैठक में महज चार लोग ही पहुंचे। इस लापरवाही से नाराज प्रदेश नेतृत्व ने पूरी कमेटी को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अब नए सिरे से पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की जाएगी और दिल्ली आलाकमान को इस पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट भेजी जा रही है। माना जा रहा है कि जल्द ही कांग्रेस हाईकमान नई टीम के गठन के निर्देश जारी करेगा।

“स्वागत में भीड़, बैठक में सन्नाटा” — कांग्रेस का पुराना पैटर्न दोहराया गया

झारखंड कांग्रेस में यह कोई नई बात नहीं है कि जब प्रदेश प्रभारी या आलाकमान का कोई प्रतिनिधि रांची पहुंचता है, तो एयरपोर्ट पर भीड़ उमड़ पड़ती है, फूलमालाएं चढ़ाई जाती हैं, और होर्डिंग्स-पोस्टर से शहर सज जाता है।
लेकिन जैसे ही संगठनात्मक जिम्मेदारी निभाने की बारी आती है, वही नेता गायब नजर आते हैं। यही रवैया अब पार्टी के अंदर नाराजगी और असंतोष का कारण बनता जा रहा है।

एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा — “यह पहली बार नहीं हुआ। जब भी दिल्ली से कोई बड़ा चेहरा आता है, सब लाइन में लग जाते हैं, लेकिन जमीन पर संगठन की बात करें तो कोई आगे नहीं आता।”

प्रदेश अध्यक्ष पर भी उठे सवाल

इस घटनाक्रम ने प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी के अंदर से आवाजें उठ रही हैं कि वे संगठन में अनुशासन और जवाबदेही तय नहीं कर पा रहे हैं। निकाय चुनाव सिर पर हैं और ऐसे में संगठन का यह हाल पार्टी के लिए चेतावनी का संकेत है।

गठबंधन पर भी असर संभव

कांग्रेस की इस अंदरूनी फूट का असर झारखंड में महागठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। एक विधायक ने कहा, “संगठन मजबूत होगा तो ही चुनावी जमीन तैयार होगी। केवल नारे और स्वागत से चुनाव नहीं जीते जाते।”

संगठन को अब चाहिए नई ऊर्जा और ईमानदार चेहरा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कांग्रेस ने समय रहते अपने संगठन को नई दिशा नहीं दी, तो आगामी नगर निकाय चुनाव ही नहीं, 2026 के विधानसभा चुनावों में भी उसे भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
संगठन में सक्रिय और युवा चेहरों को आगे लाने की जरूरत है, ताकि पार्टी में नई जान फूंकी जा सके।

फिलहाल झारखंड कांग्रेस “दिखावे की राजनीति” और “जमीनी सच्चाई” के बीच फंसी हुई नजर आ रही है — और यही पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।

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