न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय के बाहर तिब्बती मूल के एक अमेरिकी कार्यकर्ता द्वारा आत्मदाह करने का एक बेहद स्तब्ध करने वाला मामला सामने आया है। भारत में तिब्बती निर्वासित सरकार के मुख्यालय धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में जैसे ही इस घटना की खबर पहुंची, पूरे तिब्बती समुदाय में शोक और गहरे गुस्से का माहौल बन गया। शुक्रवार शाम होते-होते धर्मशाला के मैक्लोडगंज की सड़कें प्रदर्शनकारियों से पट गईं। यहां उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। आत्मदाह करने वाले लोबसांग पाल्डेन (लोबगा रंगजेन) लंबे समय से चीन की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे। जानकारी के अनुसार, लोबगा ने यह आत्मघाती कदम तिब्बत में चीन की बढ़ती दमनकारी नीतियों और हाल ही में बीजिंग द्वारा लागू किए गए ‘जातीय एकता और प्रगति’ कानून के कड़े विरोध में उठाया। इस घटना के बाद से ही दुनिया भर में निर्वासित जीवन जी रहे तिब्बतियों में शोक और आक्रोश की लहर है। तिब्बती ध्वज और पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे थे लोबगा न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय के बाहर गुरुवार शाम को एक ऐसी ऐतिहासिक और स्तब्ध कर देने वाली घटना घटी, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान तिब्बत मुद्दे की ओर खींच लिया है। तिब्बत की आजादी के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे 52 वर्षीय तिब्बती स्वतंत्रता सेनानी लोबसांग पाल्डेन ने चीन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के ठीक सामने खुद को आग के हवाले कर दिया। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों और रिपोर्टों के अनुसार, जब लोबगा रंगजेन संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर पहुंचे, तो उन्होंने तिब्बत की पारंपरिक पोशाक ‘चुपा’ पहनी हुई थी। उनके एक हाथ में तिब्बत का राष्ट्रीय ध्वज था। उन्होंने वहां चीन विरोधी नारे लगाए और खुद को आग के हवाले कर दिया।
धर्मशाला में शोक और आक्रोश: सड़कों पर उतरा जनसैलाब भारत में तिब्बती निर्वासित सरकार के मुख्यालय धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में जैसे ही इस घटना की खबर पहुंची, पूरे तिब्बती समुदाय में शोक और गहरे गुस्से का माहौल बन गया। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) के सिक्योंग हॉल में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए एक विशेष और भव्य प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में प्रशासन के शीर्ष नेतृत्व, बौद्ध भिक्षुओं और सभी सरकारी कर्मचारियों ने भाग लेकर लोबगा को श्रद्धांजलि दी। विशाल मशाल और कैंडल मार्च: शुक्रवार शाम होते-होते धर्मशाला के मैक्लोडगंज की सड़कें प्रदर्शनकारियों से पट गईं। बड़ी संख्या में तिब्बती आम नागरिक, महिलाएं और बौद्ध भिक्षु हाथों में मोमबत्तियां, जलती मशालें और तिब्बत की आजादी के झंडे लेकर सड़कों पर उतर आए। हवा “तिब्बत आजाद हो” और चीनी तानाशाही के खिलाफ नारों से गूंज उठी।
धर्मशाला में शोक: केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने आयोजित की प्रार्थना सभा इस दुखद घटना की खबर जैसे ही हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला पहुंची, वहां माहौल गमगीन हो गया। अमेरिका में किसी तिब्बती के आत्मदाह का पहला मामला वैसे अपनी आजादी के लिए अबतक 100 से ज्यादा तिब्बती जान दे चुके हैं। लेकिन यह अमेरिकी इतिहास में किसी तिब्बती नागरिक द्वारा आत्मदाह (Self-Immolation) किए जाने का अब तक का पहला मामला है। इस घटना के बाद से वैश्विक स्तर पर चीन के खिलाफ तिब्बती समुदाय का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। आत्मदाह से ठीक पहले जारी किया भावुक वीडियो संदेश कदम उठाने से ठीक पहले लोबगा ने एक वीडियो संदेश जारी किया था, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में उन्होंने दुनिया भर के तिब्बतियों से एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि तिब्बत की स्वतंत्रता और हमारे मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष को तेज करना होगा। कोई भी राष्ट्रीय लक्ष्य बिना कड़े प्रयासों के हासिल नहीं होता। हम सभी को क्षेत्र, संप्रदाय और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर देश हित में अपना सर्वोच्च योगदान देना होगा।”
“चीन के कठोर कानूनों ने उठाया कदम उठाने पर मजबूर किया” — सिक्योंग पेनपा त्सेरिंग केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के सिक्योंग (राष्ट्रपति) पेनपा त्सेरिंग ने घटना पर गहरा दुख और चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि चीन द्वारा तिब्बत में थोपे जा रहे कठोर और अमानवीय कानूनों ने ही लोबगा को यह आत्मघाती कदम उठाने के लिए विवश किया है। हालांकि, हम तिब्बती प्रशासन की ओर से सभी नागरिकों से पुरजोर अपील करते हैं कि वे इस तरह आत्मदाह का रास्ता न चुनें।” इसी कड़ी में सीटीए के धर्म और संस्कृति मंत्री ने भी मानव जीवन को अनमोल बताते हुए कहा कि तिब्बत के इस लंबे और ऐतिहासिक संघर्ष को जिंदा रखने के लिए युवाओं के जीवन को बचाना और जीवित रहकर लड़ना सबसे ज्यादा आवश्यक है। 2009 से अब तक 157 तिब्बती दे चुके हैं जान उल्लेखनीय है कि तिब्बत की आजादी, मानवाधिकारों की बहाली और तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा की वतन वापसी की मांग को लेकर आत्मदाह का यह कोई पहला मामला नहीं है। वर्ष 2009 से लेकर अब तक तिब्बत के भीतर और दुनिया के अलग-अलग कोनों में कुल 157 तिब्बती नागरिक न्याय की गुहार लगाते हुए आत्मदाह कर अपने प्राणों की आहुति दे चुके हैं। प्रदर्शनकारियों का कड़ा संदेश: “मौन तोड़े संयुक्त राष्ट्र”: अंतरराष्ट्रीय समुदाय से न्याय की गुहार न्यूयॉर्क से लेकर धर्मशाला तक प्रदर्शन कर रहे तिब्बती नेताओं और नागरिकों ने संयुक्त राष्ट्र (UN) और दुनिया की महाशक्तियों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। सिखों और बौद्ध भिक्षुओं सहित प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने कहा कि लोबसांग पाल्डेन का यह बलिदान तिब्बत के भीतर चीनी अत्याचारों की पराकाष्ठा को दर्शाता है। तिब्बती समुदाय ने दोटूक शब्दों में कहा है कि संयुक्त राष्ट्र अब इस गंभीर मसले पर अपनी चुप्पी तोड़े और तिब्बत में हो रहे खुलेआम मानवाधिकारों के हनन पर चीन के खिलाफ सख्त राजनयिक कदम उठाए, ताकि लोबसांग पाल्डेन की शहादत व्यर्थ न जाए। कौन थे लोबसांग पाल्डेन और क्यों उठाया यह कदम? लोबसांग पाल्डेन ‘तिब्बती नेशनल कांग्रेस NYNJ’ के अध्यक्ष थे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिब्बत की आवाज बुलंद कर रहे थे। विरोध की मुख्य वजह: पाल्डेन चीन सरकार द्वारा हाल ही में तिब्बत में लागू किए गए विवादित ‘जातीय एकता और प्रगति कानून’ का कड़ा विरोध कर रहे थे। सांस्कृतिक पहचान पर खतरा: तिब्बती प्रदर्शनकारियों का सीधा आरोप है कि इस नए काले कानून की आड़ में चीन, तिब्बत की बची-कुची सांस्कृतिक पहचान, बौद्ध परंपराओं और उनकी स्वायत्तता को हमेशा के लिए खत्म करना चाहता है। इसी दमनकारी नीति को वैश्विक मंच पर उजागर करने के लिए पाल्डेन ने सर्वोच्च बलिदान का रास्ता चुना।
न्यूयार्क में UN मुख्यालय के बाहर तिब्बती कार्यकर्ता का आत्मदाह:चीन की बर्बरता के खिलाफ उठाया कदम, धर्मशाला में आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना
By InstaKhabar
On: July 4, 2026 8:59 PM






