“चलो स्कूल चलें हम” – ये नारा कभी उम्मीद की रौशनी हुआ करता था, लेकिन आज की ज़मीनी हकीकत देखेंगे तो यह नारा सिर्फ किताबों और सरकारी इश्तिहारों तक सीमित रह गया है।
भारत की शिक्षा व्यवस्था की हालत देखकर आप वाकई दंग रह जाएंगे। हाल ही में जारी रिपोर्ट्स और सर्वेक्षणों के अनुसार:
- 47% बच्चे तीसरी कक्षा में ‘10 का पहाड़ा’ तक नहीं बोल पाते।
- 58% छात्र ही ‘गुणा-भाग’ के फार्मूलों को समझकर सही ढंग से इस्तेमाल कर पाते हैं।
यह स्थिति बताती है कि देश के लाखों बच्चों के भविष्य के साथ एक गहरा मज़ाक हो रहा है – और ये मज़ाक हो रहा है नीतियों की लापरवाही, बजट की कटौती और शिक्षा में राजनीतिक उपेक्षा की वजह से।
📉 शिक्षा बजट में लगातार कटौती
भारत सरकार ने बीते वर्षों में शिक्षा पर खर्च में लगातार कटौती की है।
2020-21 में शिक्षा पर राष्ट्रीय बजट का लगभग 3.5% खर्च किया गया था, जो 2024-25 आते-आते महज 2.9% तक लुढ़क गया।
यानी “डिजिटल इंडिया”, “स्किल इंडिया” जैसे भारी-भरकम अभियानों के बीच, देश की नींव को ही खोखला किया जा रहा है।
🏫 स्कूलों की घटती संख्या और शिक्षकों की भारी कमी
ग्रामीण भारत में बड़ी संख्या में स्कूल बंद हो रहे हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 60,000 से ज्यादा सरकारी स्कूल या तो मर्ज कर दिए गए या बंद कर दिए गए।
इसका सीधा असर बच्चों के स्कूल पहुंचने के समय, सुरक्षा, और पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ा है।
शिक्षकों की बात करें तो लाखों पद खाली हैं। कई स्कूलों में एक शिक्षक पूरे स्कूल को संभालने को मजबूर है।
📚 पढ़ाई या केवल उपस्थिति?
कई जगह बच्चों को स्कूल सिर्फ मिड-डे मील के लिए भेजा जाता है।
पढ़ाई का स्तर इतना गिर गया है कि बच्चे सिर्फ क्लास में बैठे रह जाते हैं, लेकिन उनके दिमाग़ में कुछ नहीं बैठता।
पढ़ाई के लिए जरूरी पुस्तकें, लैब, इंटरनेट, और संसाधन या तो मौजूद नहीं हैं या सिर्फ कागज़ों में हैं।
🤖 नई शिक्षा नीति – नाम बड़ा, पर काम?
सरकार ने 2020 में नई शिक्षा नीति लाई, जिसमें डिजिटल लर्निंग, स्किल डेवलपमेंट, और मातृभाषा में पढ़ाई जैसे कई पहलू जोड़े गए।
लेकिन ज़मीनी स्तर पर यह नीति अब तक क्रियान्वयन के संकट से जूझ रही है।
इंटरनेट नहीं, बिजली नहीं, शिक्षक नहीं – फिर नीति कैसे चलेगी?
❓ क्या सवाल पूछना गुनाह है?
जब भी कोई नागरिक या मीडिया शिक्षा पर सवाल उठाता है, तो सरकार आंकड़ों के पर्दे में छिप जाती है।
लेकिन एक सवाल ज़रूरी है:
क्या भारत जैसे युवा देश में शिक्षा को अनदेखा करके हम ‘विश्वगुरु’ बन सकते हैं?
🔚 निष्कर्ष
भारत की शिक्षा व्यवस्था आज असंवेदनशीलता और उपेक्षा का शिकार है।
जहां बच्चों को सपनों की उड़ान देनी थी, वहां अब गणित की गिनती और पहाड़े भी भारी पड़ रहे हैं।
“चलो स्कूल चलें हम” अब केवल एक स्लोगन नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सवाल बन चुका है।
अब वक्त है नारे नहीं, ईमानदार निवेश और ज़मीनी सुधार का।
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