रांची। झारखंड में पेसा एक्ट (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act – 1996) को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किए जाने के मामले में दायर अवमानना याचिका पर बुधवार को झारखंड हाई कोर्ट में अहम सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि झारखंड सरकार अब तक पेसा एक्ट को लागू करने में विफल रही है। यह अधिनियम आदिवासी स्वशासन, ग्रामसभा को अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करता है। अदालत को बताया गया कि सरकार की यह लापरवाही न्यायालय के पूर्व आदेशों का उल्लंघन है और इससे आदिवासी समुदाय के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
सरकार की दलील – बालू व लघु खनिज खनन पर लगी रोक हटाई जाए
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत से आग्रह किया कि बालू और लघु खनिज खनन पर लगी अंतरिम रोक को हटाया जाए।
सरकार का कहना था कि:
- इस रोक के कारण विकास कार्य रुक गए हैं।
- राजस्व संग्रह में भारी हानि हो रही है।
- पंचायत स्तर पर रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है।
सरकार का तर्क था कि यदि यह रोक जारी रही तो राज्य के बुनियादी ढांचे और लोकहित के कार्यों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
अदालत का रुख
हाई कोर्ट ने सरकार की इस मांग पर तत्काल कोई आदेश पारित नहीं किया। अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अगली सुनवाई की तारीख 9 अक्टूबर 2025 तय की। तब तक मौजूदा स्थिति (Status Quo) बनी रहेगी।
मामला क्यों संवेदनशील है?
यह पूरा मामला झारखंड में आदिवासी अधिकारों, ग्रामसभा की स्वायत्तता और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से सीधे जुड़ा है।
- पेसा एक्ट आदिवासी बहुल इलाकों में ग्रामसभा को भूमि, जल, जंगल और खनिज पर अधिकार देता है।
- कानून का उद्देश्य परंपरागत अधिकारों की रक्षा करना और स्थानीय स्वशासन को सशक्त बनाना है।
- लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी और खनन गतिविधियों पर रोक से सरकार और समुदाय दोनों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है।
अगली सुनवाई का महत्व
9 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई न केवल पेसा एक्ट के क्रियान्वयन पर रोशनी डालेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि झारखंड में बालू और लघु खनिज खनन पर लगी रोक जारी रहेगी या हटेगी।
यह मामला आने वाले दिनों में राज्य की खनिज नीति, आदिवासी अधिकारों और विकास कार्यों के बीच संतुलन की कसौटी बन सकता है।






