रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने आदिवासी बहुल क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) द्वारा बिना मुआवजा दिए रैयती जमीन पर सड़क बनाने के गंभीर आरोपों पर कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस राजेश कुमार की अदालत ने रांची उपायुक्त को पूरे मामले की जांच कर एक महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।
अदालत ने साफ कहा है कि उपायुक्त (डीसी) व्यक्तिगत तौर पर स्थल निरीक्षण करें, प्रभावित ग्रामीणों से मिलें और उनकी शिकायतों के समाधान का रास्ता निकालें। साथ ही यह भी जांच करें कि क्या वास्तव में एनएचएआई ने स्थानीय रैयती जमीन का अवैध उपयोग किया है।
बुंडू में एनएच-33 निर्माण पर विवाद
मामला रांची जिले के बुंडू थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां एनएच-33 के निर्माण के दौरान आदिवासी और अन्य स्थानीय ग्रामीणों की जमीन का उपयोग बिना मुआवजा दिए किए जाने का आरोप लगा है। ग्रामीणों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि यदि किसी भी रैयत की जमीन ली गई है तो संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत उन्हें उचित मुआवजा देना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्र में मामला और संवेदनशील
अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची (आदिवासी क्षेत्र) के अंतर्गत आता है, इसलिए उपायुक्त की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां उनकी जिम्मेदारी केवल प्रशासनिक अधिकारी की नहीं बल्कि स्थानीय लोगों के अधिकारों के रक्षक की भी है।
एनएचएआई और राज्य सरकार के बीच टकराव
इस विवाद में एक और पेच तब सामने आया जब एनएचएआई ने राज्य सरकार द्वारा करवाई गई जमीन की मापी पर ही सवाल उठा दिए। एनएचएआई का कहना है कि यह प्रक्रिया उनकी मौजूदगी के बिना की गई। वहीं, राज्य सरकार ने अपने दाखिल शपथ पत्र में स्वीकार किया है कि कई जगह जमीन का उपयोग बिना उचित मुआवजा दिए किया गया है।
अदालत की सख्ती
सुनवाई के दौरान रांची उपायुक्त ने अदालत से आग्रह किया कि वे दुर्गा पूजा के दौरान कानून-व्यवस्था के कारण व्यस्त हैं, इसलिए जांच पूरी करने के लिए अधिक समय दिया जाए। अदालत ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि तय समयसीमा में रिपोर्ट सौंपना अनिवार्य होगा।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी दोहराया कि एनएचएआई को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी रैयत को मिलने वाले मुआवजे पर आपत्ति जताए। इससे पहले भी कई मामलों में अदालत ने एनएचएआई के अधिकारियों को तलब कर फटकार लगाई थी और पूछा था कि आखिर किस कानूनी अधिकार के तहत वे स्थानीय ग्रामीणों के मुआवजे पर रोक लगाते हैं।
👉 यह मामला केवल जमीन अधिग्रहण और मुआवजा विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आदिवासी अधिकारों, पांचवीं अनुसूची की संवैधानिक गारंटी और सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही जैसे गंभीर मुद्दे भी जुड़े हुए हैं।






